श्री परशुराम चालीसा – Shri Parshuram Chalisa

श्री परशुराम चालीसा भगवान विष्णु के छठे अवतार माने जाने वाले भगवान परशुराम को समर्पित एक प्रसिद्ध भक्तिमय स्तुति और प्रार्थना है। इसमें भगवान परशुराम के दिव्य स्वरूप, शौर्य, पराक्रम, तपस्या और उनकी महिमा का वर्णन किया गया है।

श्री गुरु चरण सरोज छवि,निज मन मन्दिर धारि।
सुमरि गजानन शारदा,गहि आशिष त्रिपुरारि॥

बुद्धिहीन जन जानिये,अवगुणों का भण्डार।
बरणों परशुराम सुयश,निज मति के अनुसार॥

जय प्रभु परशुराम सुख सागर।
जय मुनीश गुण ज्ञान दिवाकर॥

भृगुकुल मुकुट विकट रणधीरा।
क्षत्रिय तेज मुख संत शरीरा॥

जमदग्नी सुत रेणुका जाया।
तेज प्रताप सकल जग छाया॥

मास बैसाख सित पच्छ उदारा।
तृतीया पुनर्वसु मनुहारा॥

प्रहर प्रथम निशा शीत न घामा।
तिथि प्रदोष व्यापि सुखधामा॥

तब ऋषि कुटीर रूदन शिशु कीन्हा।
रेणुका कोखि जनम हरि लीन्हा॥

निज घर उच्च ग्रह छः ठाढ़े।
मिथुन राशि राहु सुख गाढ़े॥

तेज-ज्ञान मिल नर तनु धारा।
जमदग्नी घर ब्रह्म अवतारा॥

धरा राम शिशु पावन नामा।
नाम जपत जग लह विश्रामा॥

भाल त्रिपुण्ड जटा सिर सुन्दर।
कांधे मुंज जनेऊ मनहर॥

मंजु मेखला कटि मृगछाला।
रूद्र माला बर वक्ष विशाला॥

पीत बसन सुन्दर तनु सोहें।
कंध तुणीर धनुष मन मोहें॥

वेद-पुराण-श्रुति-स्मृति ज्ञाता।
क्रोध रूप तुम जग विख्याता॥

दायें हाथ श्रीपरशु उठावा।
वेद-संहिता बायें सुहावा॥

विद्यावान गुण ज्ञान अपारा।
शास्त्र-शस्त्र दोउ पर अधिकारा॥

भुवन चारिदस अरु नवखंडा।
चहुं दिशि सुयश प्रताप प्रचंडा॥

एक बार गणपति के संगा।
जूझे भृगुकुल कमल पतंगा॥

दांत तोड़ रण कीन्ह विरामा।
एक दंत गणपति भयो नामा॥

कार्तवीर्य अर्जुन भूपाला।
सहस्रबाहु दुर्जन विकराला॥

सुरगऊ लखि जमदग्नी पांहीं।
रखिहहुं निज घर ठानि मन मांहीं॥

मिली न मांगि तब कीन्ह लड़ाई।
भयो पराजित जगत हंसाई॥

तन खल हृदय भई रिस गाढ़ी।
रिपुता मुनि सौं अतिसय बाढ़ी॥

ऋषिवर रहे ध्यान लवलीना।
तिन्ह पर शक्तिघात नृप कीन्हा॥

लगत शक्ति जमदग्नी निपाता।
मनहुं क्षत्रिकुल बाम विधाता॥

पितु-बध मातु-रूदन सुनि भारा।
भा अति क्रोध मन शोक अपारा॥

कर गहि तीक्षण परशु कराला।
दुष्ट हनन कीन्हेउ तत्काला॥

क्षत्रिय रुधिर पितु तर्पण कीन्हा।
पितु-बध प्रतिशोध सुत लीन्हा॥

इक्कीस बार भू क्षत्रिय बिहीनी।
छीन धरा बिप्रन्ह कहँ दीनी॥

जुग त्रेता कर चरित सुहाई।
शिव-धनु भंग कीन्ह रघुराई॥

गुरु धनु भंजक रिपु करि जाना।
तब समूल नाश ताहि ठाना॥

कर जोरि तब राम रघुराई।
बिनय कीन्ही पुनि शक्ति दिखाई॥

भीष्म द्रोण कर्ण बलवन्ता।
भये शिष्या द्वापर महँ अनन्ता॥

शास्त्र विद्या देह सुयश कमावा।
गुरु प्रताप दिगन्त फिरावा॥

चारों युग तव महिमा गाई।
सुर मुनि मनुज दनुज समुदाई॥

दे कश्यप सों संपदा भाई।
तप कीन्हा महेन्द्र गिरि जाई॥

अब लौं लीन समाधि नाथा।
सकल लोक नावइ नित माथा॥

चारों वर्ण एक सम जाना।
समदर्शी प्रभु तुम भगवाना॥

ललहिं चारि फल शरण तुम्हारी।
देव दनुज नर भूप भिखारी॥

जो यह पढ़ै श्री परशु चालीसा।
तिन्ह अनुकूल सदा गौरीसा॥

पृर्णेन्दु निसि बासर स्वामी।
बसहु हृदय प्रभु अन्तरयामी॥

परशुराम द्वारा रचित शिव स्तोत्र

॥ परशुराम कृत शिव स्तुति ॥

नमस्ते देवदेवाय शङ्करायादिमूर्त्तये।
नमः शर्वाय शान्ताय शाश्वताय नमोनमः॥ १॥

नमस्ते नीलकण्ठाय नीललोहितमूर्त्तये।
नमस्ते भूतनाथाय भूतवासाय ते नमः॥ २॥

व्यक्ताव्यक्तस्वरूपाय महादेवाय मीढुषे।
शिवाय बहुरूपाय त्रिनेत्राय नमोनमः॥ ३॥

शरणं भव मे शर्व त्वद्भक्तस्य जगत्पते।
भूयोऽनन्याश्रयाणां तु त्वमेव हि परायणम्॥ ४॥

यन्मयाऽपकृतं देव दुरुक्तं वापि शङ्कर।
अजानता त्वां भगवन्मम तत्क्षन्तुमर्हसि॥ ५॥

अनन्यवेद्यरुपस्य सद्भावमिह कः पुमान्।
त्वामृते तव सर्वेश सम्यक्शक्नोति वेदितुम्॥ ६॥

तस्मात्त्वं सर्वभावेन प्रसीद मम शङ्कर।
नान्यास्ति मे गतिस्तुभ्यं नमो भूयो नमो नमः॥ ७॥

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श्री परशुराम की स्तुति क्या है?

श्री परशुराम की स्तुति में उन्हें जामदग्न्य, भार्गव राम, परशुहस्त और क्षत्रियान्तक कहा जाता है। प्रसिद्ध स्तुति है – “कराभ्यां परशुं चापं दधानं रेणुकात्मजम्। जामदग्न्यं भजे रामं भार्गवं क्षत्रियान्तकम्॥” इसमें उनके पराक्रम और धर्म रक्षा का वर्णन होता है।

परशुराम द्वारा रचित शिव स्तोत्र क्या है?

परशुराम द्वारा रचित शिव स्तुति ब्रह्माण्ड पुराण में मिलती है। इसमें वे शिव को नमस्कार करते हुए कहते हैं – “नमस्ते देवदेवाय शङ्करायादिमूर्तये। नमः शर्वाय शान्ताय शाश्वताय नमो नमः॥” यह स्तोत्र शिव की कृपा पाने के लिए पढ़ा जाता है।

परशुराम का धनुष का क्या नाम था?

परशुराम का मुख्य अस्त्र परशु (फरसा) था, जो शिव ने दिया था। धनुष का कोई विशेष प्रसिद्ध नाम नहीं मिलता। वे कोदण्ड (धनुष) भी धारण करते थे, लेकिन उनकी पहचान परशु से ही है।

भगवान परशुराम का सबसे शक्तिशाली शिष्य कौन था?

भगवान परशुराम के प्रमुख शिष्यों में भीष्म, द्रोणाचार्य और कर्ण शामिल हैं। इनमें भीष्म पितामह को सबसे शक्तिशाली और योग्य शिष्य माना जाता है। उन्होंने उनसे अस्त्र-शस्त्र की विद्या सीखी थी।

परशुराम ने 21 बार क्षत्रियों को क्यों मारा था?

कार्तवीर्य अर्जुन ने उनके पिता जमदग्नि का वध कर दिया था। क्रोध में परशुराम ने हैहय वंश सहित अत्याचारी क्षत्रियों का 21 बार संहार किया। पिता के शरीर पर 21 घाव देखकर उन्होंने यह संकल्प लिया था कि पृथ्वी को क्षत्रिय-विहीन कर देंगे।

ॐ रां रां ॐ रां रां परशुहस्ताय नमः का क्या अर्थ है?

इस मंत्र का अर्थ है – परशु (फरसा) धारण करने वाले भगवान परशुराम को नमस्कार। ‘रां’ उनके बीज मंत्र हैं। यह मंत्र शक्ति, साहस और शत्रु विनाश के लिए जपा जाता है। नियमित जाप से उनकी कृपा मिलती है।

श्री परशुराम का मंत्र क्या है?

मूल मंत्र है – ॐ रां रां ॐ रां रां परशुहस्ताय नमः।
गायत्री मंत्र: ॐ जामदग्न्याय विद्महे महावीराय धीमहि। तन्नो परशुरामः प्रचोदयात्॥
ये मंत्र शक्ति और सुरक्षा के लिए प्रभावशाली माने जाते हैं।

भगवान परशुराम किस जाति के थे?

भगवान परशुराम ब्राह्मण थे। वे भृगु वंश के महर्षि जमदग्नि और माता रेणुका के पुत्र थे। ब्राह्मण होते हुए भी उन्होंने क्षत्रिय धर्म का पालन किया और अत्याचारी राजाओं का संहार किया।

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