आज की तिथि

आज की तिथि
ग्रह-नक्षत्र गणना जारी है...

📅 आज की तिथि एवं पंचांग के 5 अंग

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☀️Day
🌙Night
सूर्योदय: -- सूर्यास्त: --
पंचांग के मुख्य 5 अंग (Five Limbs of Panchang)
१. तिथि----
२. नक्षत्र----
३. योग----
४. करण----
५. वार एवं पक्ष--
आनन्दादि योग--
संवत एवं मास विवरण
संवत विवरण--
मास एवं पक्ष--
सूर्योदय / सूर्यास्त--
चंद्र राशि--
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आज की तिथि – Today Tithi

ऊपर दिए टूल में आज की तिथि के साथ ये सारी जानकारी कार्ड में दिखती है: तिथि, नक्षत्र, योग, करण, पक्ष एवं वार, और आनन्दादि योग। इस लेख में हर कार्ड का मतलब आसान भाषा में समझाया गया है, ताकि टूल खोलते ही पूरा पंचांग पढ़ना आ जाए।

आज की तिथि की गणना

तिथि का संबंध चंद्रमा और सूर्य की आपसी दूरी से है। जब चंद्रमा, सूर्य से 12 अंश आगे बढ़ जाता है, तो एक तिथि पूरी मानी जाती है, और इस तरह पूरे चंद्र मास में 30 तिथियां बनती हैं।

चंद्रमा की चाल रोज एक जैसी नहीं रहती, इसलिए कोई तिथि करीब 19 घंटे की निकलती है तो कोई 26 घंटे की। यही वजह है कि तिथि दिन के किसी भी समय बदलते रहता है।

हमारे साइट में यह “समाप्ति” के साथ दिखाया जाता है। जैसे लिखा हो “दशमी, समाप्ति 2:06 PM, तत्पश्चात एकादशी”, तो इसका मतलब है कि दोपहर 2:06 बजे तक दशमी रहेगी, और उसके बाद एकादशी शुरू हो जाएगी। यानी एक ही दिन में दो तिथियां भी पड़ सकती हैं।

कभी-कभी कोई तिथि सूर्योदय को छू ही नहीं पाती और एक दिन में निकल जाती है, इसे तिथि क्षय कहते हैं। कभी कोई तिथि दो सूर्योदय तक खिंच जाती है, इसे तिथि वृद्धि कहा जाता है।

व्रत और त्योहार के लिए आमतौर पर वही तिथि गिनी जाती है जो सूर्योदय के समय चल रही हो, जिसे उदया तिथि कहते हैं।

शुक्ल पक्ष और कृष्ण पक्ष

एक चंद्र मास दो हिस्सों में बंटा होता है, और हर हिस्से में 15 तिथियां आती हैं।

  • शुक्ल पक्ष: अमावस्या के बाद शुरू होता है और पूर्णिमा तक चलता है। इसमें चंद्रमा की रोशनी रोज बढ़ती है
  • कृष्ण पक्ष: पूर्णिमा के बाद शुरू होता है और अमावस्या तक चलता है। इसमें चंद्रमा की रोशनी धीरे-धीरे घटती है

टूल में “पक्ष एवं वार” इसी को बताता है, जैसे “शुक्ल पक्ष, बुधवार”। पक्ष बदलने पर तिथि का नाम वही रहता है, बस आगे लगने वाला पक्ष बदल जाता है। इसीलिए “एकादशी” कहने के बजाय “शुक्ल पक्ष की एकादशी” कहना ज्यादा सही माना जाता है।

पंद्रह तिथियों के नाम और उनसे जुड़े प्रमुख पर्व

क्रमतिथिइससे जुड़े आम पर्व और परंपराएं
1प्रतिपदापक्ष की शुरुआत, नवरात्रि का पहला दिन
2द्वितीयाभाई दूज
3तृतीयाहरतालिका तीज, अक्षय तृतीया
4चतुर्थीगणेश चतुर्थी, संकष्टी चतुर्थी
5पंचमीवसंत पंचमी, नाग पंचमी
6षष्ठीछठ पूजा, कार्तिकेय पूजन
7सप्तमीसूर्य उपासना
8अष्टमीदुर्गाष्टमी, कृष्ण जन्माष्टमी
9नवमीरामनवमी, महानवमी
10दशमीविजयादशमी
11एकादशीविष्णु जी का व्रत
12द्वादशीएकादशी व्रत का पारण
13त्रयोदशीप्रदोष व्रत, धनतेरस
14चतुर्दशीमासिक शिवरात्रि, महाशिवरात्रि
15पूर्णिमा या अमावस्यासत्यनारायण कथा, स्नान-दान, पितृ तर्पण

तिथि पांच प्रकार के होते है

परंपरा में तिथियों को स्वभाव के हिसाब से पांच वर्गों में रखा गया है:

  • नंदा: प्रतिपदा, षष्ठी, एकादशी
  • भद्रा: द्वितीया, सप्तमी, द्वादशी
  • जया: तृतीया, अष्टमी, त्रयोदशी
  • रिक्ता: चतुर्थी, नवमी, चतुर्दशी
  • पूर्णा: पंचमी, दशमी, पूर्णिमा

रिक्ता तिथियों में नया शुभ काम शुरू करना आमतौर पर टाला जाता है, जबकि पूर्णा तिथियों को अच्छा माना जाता है। अमावस्या शुभ कामों के लिए ठीक नहीं गिनी जाती, पर पितृ कर्म के लिए इसी का महत्व है।

वार: सात दिन और उनके स्वामी ग्रह

पंचांग में दिन सूर्योदय से शुरू होकर अगले सूर्योदय तक माना जाता है। हर वार का एक स्वामी ग्रह है, और उससे जुड़ी पूजा की परंपरा भी चलती है।

वारस्वामी ग्रहआम तौर पर किसकी पूजा
रविवारसूर्यसूर्य देव
सोमवारचंद्रमाशिव जी
मंगलवारमंगलहनुमान जी
बुधवारबुधगणेश जी
गुरुवारबृहस्पतिविष्णु जी, गुरु
शुक्रवारशुक्रलक्ष्मी जी, संतोषी माता
शनिवारशनिशनि देव, हनुमान जी

नक्षत्र और चरण

आकाश में चंद्रमा के रास्ते को 27 बराबर हिस्सों में बांटा गया है, इन्हीं को नक्षत्र कहते हैं। हर नक्षत्र के चार चरण होते हैं, यानी कुल 108 चरण, चंद्रमा एक नक्षत्र में करीब एक दिन रहता है।

जैसे अगर लिखा हो “धनिष्ठा (चरण 2), समाप्ति 7:43 PM, तत्पश्चात शतभिषा”, तो इसका मतलब है कि चंद्रमा अभी धनिष्ठा नक्षत्र के दूसरे चरण में है, और शाम 7:43 बजे के बाद शतभिषा में चला जाएगा।

सत्ताईस नक्षत्रों के नाम

अश्विनी, भरणी, कृत्तिका, रोहिणी, मृगशिरा, आर्द्रा, पुनर्वसु, पुष्य, आश्लेषा, मघा, पूर्वाफाल्गुनी, उत्तराफाल्गुनी, हस्त, चित्रा, स्वाति, विशाखा, अनुराधा, ज्येष्ठा, मूल, पूर्वाषाढ़ा, उत्तराषाढ़ा, श्रवण, धनिष्ठा, शतभिषा, पूर्वाभाद्रपद, उत्तराभाद्रपद और रेवती।

नक्षत्र का स्वामी ग्रह

स्वामी ग्रहनक्षत्र
केतुअश्विनी, मघा, मूल
शुक्रभरणी, पूर्वाफाल्गुनी, पूर्वाषाढ़ा
सूर्यकृत्तिका, उत्तराफाल्गुनी, उत्तराषाढ़ा
चंद्रमारोहिणी, हस्त, श्रवण
मंगलमृगशिरा, चित्रा, धनिष्ठा
राहुआर्द्रा, स्वाति, शतभिषा
बृहस्पतिपुनर्वसु, विशाखा, पूर्वाभाद्रपद
शनिपुष्य, अनुराधा, उत्तराभाद्रपद
बुधआश्लेषा, ज्येष्ठा, रेवती

नक्षत्र और चरण का सबसे आम इस्तेमाल दो जगह होता है। एक, बच्चे के जन्म नक्षत्र के चरण से नामकरण का पहला अक्षर तय करने में। दूसरा, मुहूर्त निकालने में, क्योंकि कुछ नक्षत्र शादी, गृह प्रवेश या खरीदारी के लिए अच्छे माने जाते हैं।

योग: सूर्य और चंद्रमा के मेल से बनने वाला पंचांग योग

पंचांग में योग का मतलब कुंडली वाले राजयोग जैसा नहीं है। यहां सूर्य और चंद्रमा की दूरी को जोड़कर 13 अंश 20 कला के 27 हिस्सों में बांटा जाता है, और हर हिस्से का एक नाम तय है। हर योग करीब एक दिन के आसपास चलता है।

सत्ताईस योगों के नाम

विष्कुम्भ, प्रीति, आयुष्मान, सौभाग्य, शोभन, अतिगण्ड, सुकर्मा, धृति, शूल, गण्ड, वृद्धि, ध्रुव, व्याघात, हर्षण, वज्र, सिद्धि, व्यतीपात, वरीयान, परिघ, शिव, सिद्ध, साध्य, शुभ, शुक्ल, ब्रह्म, इन्द्र और वैधृति।

करण: तिथि का आधा हिस्सा

करण का मतलब है आधी तिथि, हर तिथि में दो करण आते हैं। इसलिए एक चंद्र मास में कुल 60 करण बनते हैं। नाम सिर्फ 11 हैं, जो दो तरह के होते हैं।

चर करण (7)

बव, बालव, कौलव, तैतिल, गर, वणिज और विष्टि। ये क्रम से बार-बार दोहराए जाते हैं

स्थिर करण (4)

शकुनि, चतुष्पद, नाग और किंस्तुघ्न। ये महीने में सिर्फ एक बार आते हैं, अमावस्या के आसपास और शुक्ल प्रतिपदा के पहले हिस्से में

विष्टि करण को ही भद्रा कहा जाता है, जिसमें शुभ और मांगलिक काम टालने की सलाह दी जाती है। भद्रा आमतौर पर इन समयों में पड़ती है:

  • शुक्ल पक्ष: चतुर्थी और एकादशी का दूसरा हिस्सा, अष्टमी और पूर्णिमा का पहला हिस्सा
  • कृष्ण पक्ष: तृतीया और दशमी का दूसरा हिस्सा, सप्तमी और चतुर्दशी का पहला हिस्सा

आनन्दादि योग

आनन्दादि योग पंचांग के उन हिस्सों में है जिन्हें कम लोग जानते हैं, पर कई जगह मुहूर्त देखते वक्त इसका जिक्र होता है। यह वार और नक्षत्र के मेल से तय होता है, और इसके कुल 28 योग हैं।

अट्ठाईस आनन्दादि योगों के नाम

आनन्द, कालदण्ड, धूम्र, प्रजापति, सौम्य, ध्वांक्ष, ध्वज, श्रीवत्स, वज्र, मुद्गर, छत्र, मित्र, मानस, पद्म, लुम्ब, उत्पात, मृत्यु, काण, सिद्धि, शुभ, अमृत, मुसल, गद, मातंग, राक्षस, चर, स्थिर और प्रवर्धमान।

निकालने का तरीका: हर वार के लिए एक शुरुआती नक्षत्र तय है, जहां से पहला योग यानी आनन्द माना जाता है। फिर उस नक्षत्र से गिनते हुए आगे बढ़ते हैं, और इस गिनती में अभिजित को भी एक नक्षत्र गिना जाता है, इसीलिए संख्या 28 बनती है।

इन योगों में आनन्द, मित्र, सिद्धि और अमृत जैसे नाम शुभ माने जाते हैं, जबकि कालदण्ड, मृत्यु, उत्पात और राक्षस जैसे नाम अशुभ गिने जाते हैं। हालांकि अलग-अलग क्षेत्रों और परंपराओं में इनका फल थोड़ा अलग हो सकता है।

आज की तिथि जानने के लाभ

  • व्रत और पूजा: एकादशी, प्रदोष, चतुर्थी और पूर्णिमा जैसे व्रत तिथि देखकर ही रखे जाते हैं
  • श्राद्ध और तर्पण: परिवार में किसी का देहांत जिस तिथि को हुआ हो, उसी तिथि पर श्राद्ध करने की परंपरा है
  • तिथि वाला जन्मदिन: कई परिवार बच्चों का जन्मदिन अंग्रेजी तारीख के साथ-साथ हिंदू तिथि के हिसाब से भी मनाते हैं
  • शुभ काम की शुरुआत: रिक्ता तिथि, गण्ड जैसे योग और भद्रा जैसे समय को ध्यान में रखकर काम की तारीख तय की जाती है

यह जानकारी पंचांग और पारंपरिक ज्योतिष की प्रचलित बातों पर आधारित है। अलग-अलग क्षेत्रों और परिवारों में तिथि और योग का फल मानने के तरीके में थोड़ा फर्क मिलता है।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

आज की तिथि कैसे पता करें?

हमारे साइट harinav.com में आज की तिथि और उसके खत्म होने का समय सबसे ऊपर के कार्ड में दिखता है। साथ में अगली तिथि का नाम भी देख सकते है।

तिथि दिन के बीच में क्यों बदल जाती है?

क्योंकि तिथि चंद्रमा और सूर्य की दूरी से बनती है, घड़ी से नहीं। चंद्रमा की चाल रोज अलग होती है, इसलिए तिथि कभी 19 घंटे की तो कभी 26 घंटे की निकल जाती है।

शुक्ल पक्ष और कृष्ण पक्ष में क्या अंतर है?

शुक्ल पक्ष अमावस्या से पूर्णिमा तक चलता है, जिसमें चंद्रमा बढ़ता है। कृष्ण पक्ष पूर्णिमा से अमावस्या तक चलता है, जिसमें चंद्रमा घटता है।

नक्षत्र के चरण का क्या मतलब होता है?

हर नक्षत्र के चार बराबर हिस्से होते हैं, जिन्हें चरण कहते हैं। जन्म के समय चंद्रमा जिस नक्षत्र के जिस चरण में हो, उसी से बच्चे के नाम का पहला अक्षर तय किया जाता है।

आनन्दादि योग कैसे बनता है?

यह वार और नक्षत्र को मिलाकर बनता है। हर वार के लिए एक शुरुआती नक्षत्र तय है, और वहां से गिनते हुए आज के नक्षत्र तक पहुंचने पर जो नंबर आता है, वही आनन्दादि योग का नाम तय करता है।

सबसे शुभ तिथि कौन सी है?

माना जाता है की पूर्णिमा, एकादशी, और द्वितीया आदि को सबसे शुभ माना जाता है। लेकिन हर काम के लिए अलग तिथि होती है।