Rudraksha Calculator

Rudraksha Calculator

Rudraksha Calculator की मदद से आप अपनी राशि और जन्म कुंडली के अनुसार अपने लिए सही रुद्राक्ष के बारे में जान सकते हैं।

✨ Vedic Rudraksha Recommendation (रुद्राक्ष परामर्श)

रुद्राक्ष को धरती की सबसे पवित्र चीजों में गिना जाता है। कहा जाता है कि यह भगवान शिव का ही एक रूप है। शिव महापुराण और देवी भागवत पुराण में इसकी महिमा विस्तार से बताई गई है। बहुत से लोग इसे सिर्फ एक माला या गहना समझ लेते हैं, पर परंपरा में इसे साधना और सुरक्षा दोनों से जोड़कर देखा गया है। नीचे इसकी पूरी जानकारी आसान भाषा में दी जा रही है।

रुद्राक्ष का शिव

रुद्राक्ष शब्द दो हिस्सों से बना है, रुद्र यानी शिव और अक्ष यानी आंख या आंसू। पुराणों में कहा गया है कि जब शिव जी ने लंबी तपस्या के बाद आंखें खोलीं, तो उनकी आंखों से कुछ आंसू धरती पर गिरे, और उन्हीं से रुद्राक्ष के पेड़ पैदा हुए। एक कथा यह भी बताती है कि शिव जी ने खुद ये रुद्राक्ष विष्णु जी के भक्तों और सभी लोगों के कल्याण के लिए बांटे थे।

असल में रुद्राक्ष एक पेड़ के फल की गुठली है। फल हरी आभा वाला होता है और फूल सफेद। गुठली पर जो धारियां दिखती हैं, उन्हें ही रुद्राक्ष का मुख कहा जाता है। मुख, रंग और आकार, तीनों कुदरती होते हैं, इन्हें इंसान नहीं बना सकता है ।

रुद्राक्ष कहां पाए जाते हैं

भारत में रुद्राक्ष उत्तराखंड के जंगलों, बंगाल, असम, मैसूर और नीलगिरि की पहाड़ियों में काफी मिलते हैं। नेपाल और इंडोनेशिया के रुद्राक्ष भी बहुत मशहूर हैं। नेपाल के रुद्राक्ष आमतौर पर आंवले जैसे बड़े आकार के होते हैं, जबकि इंडोनेशिया के रुद्राक्ष छोटे और काले रंग के होते हैं। शिव महापुराण में कहा गया है कि आंवले के आकार का रुद्राक्ष हर तरह के अनिष्ट को दूर करने वाला माना जाता है।

रुद्राक्ष कितने तरह के होते हैं

रुद्राक्ष के भेद गिनना आसान नहीं है। अलग-अलग ग्रंथों और जानकारों ने अलग संख्या बताई है। कहीं 14 मुख तक के रुद्राक्ष बताए गए हैं, कहीं 21 मुख तक, और शिव महापुराण के एक मत में तो 38 मुख तक का जिक्र मिलता है। पर एक से चौदह मुखी रुद्राक्ष सबसे ज्यादा प्रचलित हैं, और इन्हीं का वर्णन शिव महापुराण में भी आता है। इससे ज्यादा मुख वाले रुद्राक्ष बेहद दुर्लभ होते हैं।

मुखस्वरूप माना जाता हैसंबंधित ग्रहबीज मंत्र
एक मुखीसाक्षात् शिवसूर्यॐ ह्रीं नमः
दो मुखीअर्धनारीश्वरचंद्रमाॐ नमः
तीन मुखीअग्नि देवमंगलॐ क्लीं नमः
चार मुखीब्रह्मा जीबुधॐ ह्रीं नमः
पांच मुखीकालाग्नि रुद्रबृहस्पतिॐ ह्रीं नमः
छह मुखीकार्तिकेयशुक्रॐ ह्रीं हुं नमः
सात मुखीअनंग, सप्त ऋषिशनिॐ हुं नमः
आठ मुखीभैरव, गणेश जीराहुॐ हुं नमः
नौ मुखीनौ रूपों वाली मां दुर्गाकेतुॐ ह्रीं हुं नमः
दस मुखीभगवान विष्णुअलग से तय नहींॐ ह्रीं नमः
ग्यारह मुखीएकादश रुद्रअलग से तय नहींॐ ह्रीं हुं नमः
बारह मुखीद्वादश आदित्यअलग से तय नहींॐ क्रौं क्षौं रौं नमः
तेरह मुखीइंद्र और विश्वदेवअलग से तय नहींॐ ह्रीं नमः
चौदह मुखीपरमशिवअलग से तय नहींॐ नमः

इसे साक्षात् शिव का रूप कहा गया है, और यह बहुत दुर्लभ होता है। शिव महापुराण में बताया गया है कि यह भोग और मोक्ष, दोनों देने वाला है। जिस जगह इसका नियमित पूजन हो, वहां के उपद्रव शांत रहते हैं, ऐसा कहा जाता है। सूर्य से जुड़ी परेशानियों में इसे उपयोगी माना जाता है। कर्क, सिंह और मेष राशि वालों के लिए इसे खास तौर पर अनुकूल बताया जाता है।

इसे अर्धनारीश्वर यानी शिव-पार्वती का संयुक्त रूप माना जाता है। वैवाहिक जीवन की उलझनों और मन की अशांति में इसे सहारा देने वाला बताया जाता है। चंद्रमा से जुड़े असर शांत करने में भी इसे उपयोगी समझा जाता है। जिनकी शादी में देरी हो रही हो, उन्हें भी इसे पहनने की सलाह दी जाती है।

शिव पुराण के अनुसार यह साधना का फल देने वाला रुद्राक्ष है। कहा जाता है कि इसे पहनने वाला व्यक्ति कम समय में विद्या और सिद्धि की ओर बढ़ सकता है। ज्योतिष में इसे मंगल से जोड़ा जाता है, और शत्रुओं पर जीत तथा रक्त से जुड़ी परेशानियों में राहत देने वाला बताया गया है। नीरस पड़ चुके जीवन में नई उमंग जगाने की बात भी इससे जुड़ी है।

यह ब्रह्मा जी का स्वरूप माना जाता है। पढ़ाई, ज्ञान और वाणी की मिठास से इसका गहरा रिश्ता बताया जाता है। बुध ग्रह का असर शुभ करने के लिए इसे पहना जाता है। विद्यार्थियों और वेद-शास्त्र पढ़ने वालों के लिए इसे खास तौर पर अच्छा कहा जाता है।

यह सबसे आसानी से मिलने वाला रुद्राक्ष है, और शिव जी को सबसे प्रिय माना जाता है। इसमें पंचदेवों का वास बताया गया है, और इसका स्वामी ग्रह बृहस्पति है। गुरु ग्रह से होने वाली दिक्कतों में इसे सहायक माना जाता है। मेष, कर्क, सिंह, वृश्चिक, धनु और मीन राशि वालों के लिए यह खासतौर पर लाभकारी कहा जाता है। आध्यात्मिक रूप से मजबूत बनाने वाला रुद्राक्ष भी इसे कहते हैं।

इसे शिव पुत्र कार्तिकेय का रूप माना जाता है। दाहिनी भुजा में पहनने की परंपरा है। कहा जाता है कि यह दिमाग के विकास और नेतृत्व क्षमता को बढ़ाता है। शुक्र ग्रह के बुरे असर से बचाव के लिए इसे पहना जाता है।

इसे अनंग नाम से भी जाना जाता है और यह सप्त ऋषियों का प्रतीक माना जाता है। मान्यता है कि इसे पहनने वाले के घर में लक्ष्मी जी की कृपा बनी रहती है और दरिद्रता दूर रहती है। शनि ग्रह के दोष शांत करने में इसकी बड़ी भूमिका बताई जाती है।

इसे अष्टमूर्ति भैरव का स्वरूप कहा गया है, और इसके मुख्य देव गणेश जी बताए गए हैं। कहा जाता है कि इसे पहनने से इंद्रियों पर काबू रखने की शक्ति बढ़ती है, और अकाल मृत्यु का भय कम होता है। राहु से जुड़े दोष शांत करने के लिए इसे सबसे उपयुक्त माना जाता है।

यह मां दुर्गा की नौ शक्तियों का प्रतीक है, और इस पर कपिल मुनि और भैरव जी की कृपा भी बताई जाती है। केतु ग्रह के कारण आने वाली दिक्कतों को कम करने के लिए इसे पहना जाता है। इसे बायीं भुजा में धारण करने की परंपरा है। जो लोग मां दुर्गा की उपासना करते हैं, उन्हें यह रुद्राक्ष खास तौर पर प्रिय माना जाता है।

यह भगवान विष्णु के दस अवतारों को समर्पित बताया गया है। कहा जाता है कि इसे पहनने वाले की बाधाएं शांत रहती हैं और नकारात्मक शक्तियां पास नहीं आतीं। तंत्र-साधना में रुचि रखने वाले लोग भी इसे अपनाते हैं।

इसके देवता साक्षात् रुद्र माने गए हैं, और कई जगह इसे ग्यारहवें रुद्र यानी हनुमान जी से भी जोड़ा जाता है। शिव जी ने कार्तिकेय जी को बताया है कि इसे पहनने वाले को हजार अश्वमेध यज्ञ जैसा पुण्य मिलता है। व्यापार में उन्नति और हर जगह विजय की कामना से इसे पहना जाता है।

इसमें बारह आदित्यों यानी सूर्य के बारह रूपों का तेज बताया गया है, कहीं-कहीं इसे विष्णु स्वरूप भी कहा जाता है। यह नेतृत्व की क्षमता बढ़ाने वाला माना जाता है। शिव पुराण के अनुसार इसे केश में धारण करने की भी परंपरा है। कहा जाता है कि अटके हुए काम बनते हैं और सरकारी या सत्ता से जुड़ा भय दूर होता है।

इस पर विश्वदेवों और इंद्र का अधिकार माना जाता है। इसे पहनने वाले में एक अलग आकर्षण आने की बात कही जाती है, और सौभाग्य तथा सुख-सुविधा बढ़ने का भी जिक्र है। जिन लोगों के जीवन में प्रेम या गृहस्थ सुख की कमी महसूस हो, उन्हें इसे पहनने की सलाह दी जाती है।

इसे परमशिव का रूप माना गया है, और कई जगह इसे हनुमान जी का स्वरूप भी कहा जाता है। मस्तक पर भक्ति के साथ धारण करने की परंपरा है। आध्यात्मिक उन्नति, शक्ति और धन की कामना से इसे पहना जाता है। जो लोग हनुमान जी की उपासना करते हैं, उनके लिए यह खास माना जाता है।

रुद्राक्ष पहनने के फायदे

रुद्राक्ष को आध्यात्मिक और सेहत, दोनों नजरिए से उपयोगी माना जाता रहा है:

  • शिव महापुराण के अनुसार इसके पूजन और धारण से शिव-पार्वती की कृपा मिलती है
  • नकारात्मक ऊर्जा, बुरी नजर और अकाल मृत्यु के भय से रक्षा की मान्यता है
  • कई तरह की ग्रह बाधाएं शांत करने में इसे सहायक कहा गया है
  • आयुर्वेद के ग्रंथों में रक्तचाप, हृदय, कब्ज और मिर्गी जैसी परेशानियों की दवाओं में इसके इस्तेमाल का जिक्र मिलता है
  • लोग इसे तनाव, घबराहट और बेचैनी में मन को शांत रखने के लिए भी पहनते हैं
  • जो लोग बहुत यात्रा करते हैं, उनके लिए इसे ऊर्जा बनाए रखने वाला माना जाता है

अगर किसी वजह से रुद्राक्ष पहनना संभव न हो, तो उसका शिव जी की तरह पूजन और अभिषेक करने की भी परंपरा बताई गई है।

कौन सा रुद्राक्ष पहने Rudraksha Calculator से जाने

बहुत से लोग बिना सोचे-समझे कोई भी रुद्राक्ष पहन लेते हैं, जबकि हर मुख का संबंध किसी देवता और ग्रह से बताया गया है। इसीलिए सही चुनाव के लिए अपनी राशि के स्वामी ग्रह और अपनी जरूरत को समझना जरूरी माना जाता है। ग्रहों के हिसाब से देखें तो एक से नौ मुखी रुद्राक्ष क्रम से सूर्य से केतु तक के नौ ग्रहों से जुड़े हैं। अपनी कुंडली के हिसाब से कौन सा रुद्राक्ष अनुकूल रह सकता है, यह समझने के लिए हमारा रुद्राक्ष कैलकुलेटर भी देख सकते हैं।

रुद्राक्ष पहनने की विधि

रुद्राक्ष को सिर, गले, कान, भुजाओं या कमर के पास पहनने की परंपरा रही है। आम लोग आमतौर पर गले में ही पहनते हैं। शिव महापुराण में यह भी बताया गया है कि टूटा-फूटा, कीड़ों का खाया हुआ या घाव वाला रुद्राक्ष नहीं पहनना चाहिए।

  1. श्रावण महीने का कोई भी सोमवार, या पूरे श्रावण में कोई भी दिन, महाशिवरात्रि और पूर्णिमा को शुभ माना जाता है।
  2. पहनने से पहले रुद्राक्ष को कुछ समय तेल या घी में डुबोकर रखने की परंपरा है। इसमें अलग-अलग मत हैं, कहीं एक दिन देसी घी में, तो कहीं सात दिन सरसों के तेल में रखने को कहा गया है।
  3. पंचामृत (दूध, दही, शहद, तुलसी और गंगाजल) से स्नान कराकर फिर गंगाजल से धोया जाता है। इसके बाद हवन की भभूति या कुमकुम से तिलक लगाकर यह मंत्र बोलते हुए गले में धारण किया जाता है:

ॐ तत्पुरुषाय विद्महे महादेवाय धीमहि।
तन्नो रुद्रः प्रचोदयात्॥

रुद्राक्ष पहनने के नियम

  • रुद्राक्ष पहनने वाले को मांस, शराब, लहसुन और प्याज जैसी चीजों से दूर रहने की सलाह दी जाती है
  • ब्रह्मचारी, गृहस्थ, वानप्रस्थ और संन्यासी, यानी हर आश्रम के लोग, बच्चे-बूढ़े, स्त्री-पुरुष सभी इसे पहन सकते हैं
  • अशुद्ध हाथों से इसे छूना नहीं चाहिए
  • कुछ आचार्यों के मत में, अंतिम संस्कार में जाने से पहले और पति-पत्नी के संबंध के समय इसे उतार देना चाहिए, और शुद्ध होकर दोबारा पहनना चाहिए
  • रुद्राक्ष पहनने वाले को रोज शिव जी का जलाभिषेक करना चाहिए, और अगर रोज संभव न हो, तो कम से कम सोमवार या प्रदोष के दिन शिव पूजन जरूर करना चाहिए

एक बात पर अलग-अलग परंपराएं अलग राय रखती हैं: कुछ ग्रंथों में कहा गया है कि पहना हुआ रुद्राक्ष शिवलिंग से नहीं छुआना चाहिए, जबकि कुछ जगह मंदिर जाने पर उसे शिवलिंग से स्पर्श कराने की सलाह मिलती है। ऐसे में अपने गुरु या किसी विद्वान से राय लेना सही होगा।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

कौन सी राशि पर कौन सा रुद्राक्ष पहनना चाहिए?

हर राशि के लिए अलग रुद्राक्ष शुभ होता है। मेष-सिंह को 5 मुखी, वृषभ-तुला को 6-7 मुखी, मिथुन-कन्या को 4 मुखी, कर्क को 4 या गौरीशंकर, वृश्चिक को 8-13 मुखी, धनु-मीन को 1 या 9 मुखी, मकर-कुंभ को 10-13 मुखी पहनना चाहिए।

रुद्राक्ष को सिद्ध कैसे करें?

रुद्राक्ष को गंगाजल और दूध से धोकर शुद्ध करें। सोमवार या शिवरात्रि को शिव मंत्र – ॐ नमः शिवाय का जाप करते हुए धारण कर सकते है ।

सबसे ताकतवर रुद्राक्ष कौन सा है?

एकमुखी रुद्राक्ष सबसे शक्तिशाली माना जाता है। यह शिव का साक्षात रूप है और मोक्ष, मानसिक शांति व उच्च आध्यात्मिक लाभ देता है।

रुद्राक्ष कितने दिन में असर दिखाता है?

रुद्राक्ष का असर व्यक्ति की श्रद्धा और ग्रह स्थिति पर निर्भर करता है। कुछ लोग 7 से 40 दिनों में परिवर्तन महसूस करते हैं, जबकि पूर्ण लाभ कुछ महीनों में मिलता है।

रुद्राक्ष असली है या नकली कैसे पता करें कि ?

असली रुद्राक्ष पानी में डूब जाता है, जबकि नकली तैरता है और गर्म पानी में रंग भी न छोड़ता हो ये कुछ लक्षण होते है असली होने के आप चाहे तो लैब टेस्ट भी करवा सकते है ।

1 रुद्राक्ष की कीमत कितनी होती है?

एक रुद्राक्ष की कीमत मुखी और गुणवत्ता पर निर्भर करती है। सामान्य पंचमुखी 50 से 500 रुपये तक मिल जाता है। 4 से 7 मुखी 200 से 2000 रुपये, जबकि एकमुखी या दुर्लभ मुखी हजारों से लाखों रुपये तक हो सकते हैं।

रुद्राक्ष का कौन सा मुख किस ग्रह से जुड़ा है?

एक मुखी सूर्य से, दो मुखी चंद्रमा से, तीन मुखी मंगल से, चार मुखी बुध से, पांच मुखी बृहस्पति से, छह मुखी शुक्र से, सात मुखी शनि से, आठ मुखी राहु से और नौ मुखी केतु से जुड़ा बताया गया है।