रत्न कैलकुलेटर

रत्नों का जिक्र वेदों, पुराणों, आयुर्वेद ग्रंथों और धर्मशास्त्रों में मिलता है। बृहत्संहिता जैसे ज्योतिष ग्रंथों में तो इन्हें ग्रहों की बाधा शांत करने वाले उपाय के तौर पर भी समझाया गया है। माना जाता है कि हर ग्रह का अपना एक खास रत्न होता है, और सही रत्न पहनने से उस ग्रह का अच्छा असर बढ़ सकता है।
पर यह तभी माना जाता है जब रत्न ज्योतिष के नियमों के हिसाब से चुना जाए। गलत रत्न पहनने से फायदे की जगह उलटा असर भी बताया जाता है। इसीलिए यहां अपना जन्म विवरण भरकर देखिए, आपकी कुंडली के हिसाब से कौन से रत्न (Gemstone ) अनुकूल हो सकते हैं, इसकी पूरी सूची सामने आ जाएगी।
नौ रत्नों की पूरी जानकारी, ज्योतिष में प्रयोग और धारण विधि
रत्नों का जिक्र वेदों, पुराणों और धर्मशास्त्रों में मिलता है। रत्न समुच्चय और भाव प्रकाश जैसे ग्रंथों में इन पर विस्तार से लिखा गया है। बृहत्संहिता जैसे ज्योतिष ग्रंथों में रत्नों को ग्रहों से जोड़कर उनकी उत्पत्ति और ग्रह बाधा शांत करने की भूमिका समझाई गई है।
आयुर्वेद के प्रसिद्ध ग्रंथ शारंगधर संहिता में कहा गया है कि हर वस्तु के अपने रस, गुण, वीर्य, विपाक और प्रभाव होते हैं, और इनमें जरा सा फर्क आने पर असर बदल जाता है। इसीलिए रत्न को दवा की तरह देखा जाता है, जिसे बिना जाने-समझे नहीं पहनना चाहिए।
नवग्रह और उनके नौरत्न
ज्योतिष ग्रंथों के अनुसार हर ग्रह का एक खास रत्न माना गया है। सूर्य का माणिक्य, चंद्रमा का मोती, मंगल का मूंगा, बुध का पन्ना, बृहस्पति का पुखराज, शुक्र का हीरा, शनि का नीलम, राहु का गोमेद और केतु का लहसुनिया। इन्हीं नौ को मुख्य रत्न कहा जाता है। इनके अलावा उपरत्न भी होते हैं, जिनकी गिनती 84 बताई गई है, पर ज्योतिषी ग्रहों के उपचार में मुख्य रूप से इन्हीं नौ का सहारा लेते हैं।
| ग्रह | रत्न | धारण का दिन | धातु | उंगली | बीज मंत्र |
|---|---|---|---|---|---|
| सूर्य | माणिक्य | रविवार | स्वर्ण, तांबा, पंचधातु | अनामिका | ॐ घृणि सूर्याय नमः |
| चंद्रमा | मोती | सोमवार | चांदी | कनिष्ठिका | ॐ सों सोमाय नमः |
| मंगल | मूंगा | मंगलवार | स्वर्ण, तांबा, पंचधातु | तर्जनी या अनामिका | ॐ अं अंगारकाय नमः |
| बुध | पन्ना | बुधवार | स्वर्ण, चांदी, पंचधातु | मध्यमा या कनिष्ठिका | ॐ बुं बुधाय नमः |
| बृहस्पति | पुखराज | गुरुवार | स्वर्ण, पंचधातु | तर्जनी | ॐ बृं बृहस्पतये नमः |
| शुक्र | हीरा | शुक्रवार | स्वर्ण, चांदी | अनामिका | ॐ शुं शुक्राय नमः |
| शनि | नीलम | शनिवार | चांदी, स्वर्ण, पंचधातु | मध्यमा | ॐ शं शनैश्चराय नमः |
| राहु | गोमेद | बुधवार या शनिवार | चांदी, अष्टधातु | मध्यमा | ॐ रां राहवे नमः |
| केतु | लहसुनिया | शनिवार या मंगलवार | स्वर्ण, चांदी | जानकार की सलाह से | ॐ कें केतवे नमः |
1. माणिक्य (Ruby)
परिचय:
संस्कृत साहित्य में माणिक्य को रविरत्न, पद्मराग और कुरुविंद भी कहा गया है। अंग्रेजी में यह रूबी है और फारसी में याकूत। कठोरता में हीरे के बाद इसी का नंबर आता है। इसका चटकीला लाल रंग सदियों से राजा-महाराजाओं को लुभाता रहा है। भारत की सीमा से लगे म्यांमार का लाल माणिक्य दुनिया भर में मशहूर है। श्रीलंका, अफ्रीका, अफगानिस्तान और दक्षिण भारत के करूर-कंगयाम इलाके में भी यह मिलता है। आयुर्वेद प्रकाश के अनुसार लाल कमल की पंखुड़ी जैसी दमक वाला, पारदर्शी, चिकना और सुडौल माणिक्य सबसे उत्तम माना जाता है। आजकल बाजार में ज्यादातर संश्लेषित (बनावटी) माणिक्य ही बिकते हैं, इसलिए खरीदते वक्त सावधानी जरूरी है।
ज्योतिष में प्रयोग:
माणिक्य पर सूर्य का अधिकार माना गया है। जब कुंडली में सूर्य शुभ भावों का स्वामी हो पर कमजोर पड़कर फल न दे पा रहा हो, तब माणिक्य पहनना लाभकारी बताया जाता है। सिंह राशि का स्वामी सूर्य है, इसलिए सिंह लग्न या राशि वाले भी योग्य सलाह से इसे पहन सकते हैं। आयुर्वेद के ग्रंथों में इसके औषधीय प्रयोग का जिक्र मिलता है। कहा यह भी जाता है कि माणिक्य आने वाले संकट का पहले से इशारा दे देता है।
धारण विधि:
माणिक्य को स्वर्ण, तांबे या पंचधातु में पहना जाता है। रविवार, और कृतिका, उत्तराफाल्गुनी या उत्तराषाढ़ा नक्षत्र इसके लिए ठीक माने जाते हैं। सामुद्रिक शास्त्र में अनामिका उंगली पर सूर्य का नियंत्रण बताया गया है, इसलिए इसे इसी उंगली में पहनते हैं। वजन 3 रत्ती से कम नहीं होना चाहिए। पहनने से पहले इसे गाय के कच्चे दूध या गंगाजल में कुछ देर डुबोकर रखें, फिर भगवान शिव का ध्यान करके इस मंत्र का 108 बार जाप करें:
ॐ घृणि सूर्याय नमः।
2. मोती (Pearl)
परिचय:
मोती नवरत्नों में बहुत अहम रत्न है। अच्छी संगत का उदाहरण देने के लिए साहित्य में सदियों से मोती की मिसाल दी जाती रही है। कहा जाता है कि स्वाति नक्षत्र की बूंद घोंघे के मुंह में गिरे तो मोती बनती है और सांप के मुंह में गिरे तो जहर। ज्योतिष में मोती को चंद्रमा का रत्न माना गया है। यह समुद्र की तलहटी में हजारों सीपों में से कुछ में ही मिलता है। आज कृत्रिम मोती भी खूब बनते हैं, पर प्राकृतिक और कृत्रिम मोती की चमक, आकृति और गुणों में बड़ा अंतर बताया जाता है। आयुर्वेद प्रकाश के अनुसार अच्छा मोती गोल, चिकना, चंद्रमा जैसा उजला, बड़ा और हल्का होता है। बृहत्संहिता में फारस की खाड़ी का मोती सबसे उम्दा बताया गया है। श्रीलंका, वेनेजुएला, ऑस्ट्रेलिया और प्रशांत महासागर के मोती भी अच्छे माने जाते हैं।
ज्योतिष में प्रयोग:
अगर कुंडली में चंद्रमा कमजोर होकर परेशान कर रहा हो, तो मोती पहनने की सलाह दी जाती है। कर्क लग्न या चंद्र राशि वाले लोग भी योग्य ज्योतिषी से पूछकर इसे पहन सकते हैं। आयुर्वेद के ग्रंथों में हृदय, मधुमेह, मूत्र संक्रमण, बुखार और पाचन से जुड़ी परेशानियों में मोती के प्रयोग का उल्लेख मिलता है, आमतौर पर पिष्टी और भस्म के रूप में। इसे महिलाओं के लिए खास तौर पर अच्छा बताया गया है।
धारण विधि:
मोती 2, 4, 6 और 11 रत्ती का सबसे अच्छा माना जाता है, जबकि 7 या 8 रत्ती से बचना चाहिए। किसी भी महीने के शुक्ल पक्ष के सोमवार को दाहिने हाथ की कनिष्ठिका में इसे पहना जाता है। पहले इसे गाय के दूध से बने पंचामृत और गंगाजल से धोएं, फिर इस मंत्र से अभिमंत्रित करके चांदी में धारण करें:
ॐ सों सोमाय नमः।
3. मूंगा (Red Coral)
परिचय:
मूंगा खनिज रत्न नहीं है। यह समुद्र के छोटे जीवों की बनाई हुई रचना है, जो बिना पत्तों और टहनियों वाले पेड़ जैसी आकृति बनाते हैं। इसीलिए कुछ ग्रंथों में इसे लतामणि भी कहा गया है। इसके और नाम हैं प्रवाल, विद्रुम और कोरल। मूंगा आमतौर पर एक फुट ऊंचा और एक इंच चौड़ा होता है। इसका लाल रंग घिसने के बाद और निखर जाता है, इसलिए गहनों में इसका इस्तेमाल सदियों से होता आया है। अच्छा मूंगा ईरान की खाड़ी, अल्जीरिया और हिंद महासागर में मिलता है। आयुर्वेद के ग्रंथों के अनुसार उत्तम प्रवाल की बेल उगते सूरज की किरणों जैसी लाल आभा वाली होती है, समुद्र के भीतर पैदा हुई हो और घिसने पर भी चमक न छोड़े।
ज्योतिष में प्रयोग:
मूंगे का संबंध मंगल से जोड़ा गया है। जन्मपत्रिका में मंगल क्रूर हो तो मूंगा पहनाया जा सकता है। मांगलिक दोष में भी इसे शास्त्रसम्मत उपाय बताया गया है। कुंडली में चंद्रमा और मंगल की युति हो तो चांदी में भी मूंगा पहना जा सकता है। मेष और वृश्चिक लग्न या राशि वालों के लिए यह अच्छा विकल्प माना जाता है। आयुर्वेद में स्नायु संबंधी परेशानी, कब्ज, खुजली और त्वचा रोगों के संदर्भ में इसका जिक्र आता है। ज्योतिषी की सलाह के बिना मूंगा नहीं पहनना चाहिए।
धारण विधि:
मंगल की परेशानी में 9, 11 या 12 रत्ती का मूंगा पहना जा सकता है, जबकि 5 या 14 रत्ती से बचें। इसे स्वर्ण, तांबे या पंचधातु में, ज्योतिषी की राय के अनुसार तर्जनी या अनामिका में पहना जाता है। शुक्ल पक्ष के मंगलवार को हनुमान जी को प्रणाम करके, आरती-सेवा के बाद, गंगाजल से धोकर इस मंत्र का 108 बार जाप करें:
ॐ अं अंगारकाय नमः।
4. पन्ना (Emerald)
परिचय:
प्राचीन साहित्य में पन्ने की खूब तारीफ मिलती है। राजाओं और साहूकारों के यहां यह कलाकृतियों में जड़ा जाता रहा है। यह सुंदर हरे रंग का रत्न है, जिसमें हरे और नीले रंग की झाईं भी दिखती है। वैज्ञानिक अध्ययनों के मुताबिक क्रोमियम की वजह से इसका रंग हरा होता है। आजकल बेहतरीन पन्ने के लिए कोलंबिया की खदानें मशहूर हैं। ब्राजील और रूस के यूराल पर्वत में भी इसकी खदानें हैं। पुराने समय में ज्यादातर पन्ना मिस्र से आता था। जाम्बिया और श्रीलंका का पन्ना भी नामी है। भारत में उदयपुर और अजमेर में यह निकलता है। आयुर्वेद प्रकाश के अनुसार शुद्ध पन्ना भारी, चमकदार, लोचदार, सीधा-सुडौल और पानी जैसा स्वच्छ होता है। ऐसा निर्दोष पन्ना मिलना बहुत मुश्किल है, और मिल जाए तो कीमत हीरे-माणिक्य से भी ज्यादा हो सकती है। असली पन्ना भंगुर होता है, इसलिए इसे संभालकर बरतना चाहिए।
ज्योतिष में प्रयोग:
वैदिक ज्योतिष में पन्ने पर बुध ग्रह का नियंत्रण माना गया है। कुंडली में बुध कारक होकर भी बलहीन हो, तो पन्ना पहनकर उसकी अनुकूलता बढ़ाई जा सकती है। मिथुन और कन्या लग्न वालों के लिए इसे खास तौर पर उपयोगी बताया जाता है। बुध का रिश्ता बुद्धि और व्यापार से जोड़ा जाता है, इसीलिए कारोबार में तरक्की चाहने वाले भी इसे पहनते हैं। आयुर्वेद के ग्रंथों में पन्ने को विषनाशक बताते हुए घाव और बवासीर जैसी दिक्कतों में उपयोगी कहा गया है।
धारण विधि:
पन्ना स्वर्ण, चांदी या पंचधातु में पहना जा सकता है। किसी भी महीने के शुक्ल पक्ष के बुधवार को सूर्योदय के 2 घटी (करीब 48 मिनट) के भीतर इसे पहनना चाहिए, मध्यमा या कनिष्ठिका उंगली में। उस दिन पहले इसे गाय के कच्चे दूध और गंगाजल से शुद्ध करें, भगवान विष्णु को प्रणाम करें और इस मंत्र का 108 बार जाप करें:
ॐ बुं बुधाय नमः।
5. पुखराज (Yellow Sapphire)
परिचय:
नवरत्नों में पुखराज का नाम बड़े आदर से लिया जाता है। पीली आभा वाले इस रत्न को संस्कृत में पीत स्फटिक और पुष्पराग भी कहा गया है। अंग्रेजी में इसके लिए टोपाज या यलो सैफायर जैसे नाम चलते हैं। सबसे बढ़िया पुखराज ब्राजील की खानों से आते हैं, और श्रीलंका के पुखराज भी अच्छे माने जाते हैं। कहा जाता है कि जहां पुखराज और माणिक्य की खानें पास-पास हों, वहां का पुखराज खास तौर पर उत्तम होता है। प्राचीन ग्रंथों के अनुसार अच्छा पुखराज भारी, अमलतास के फूल जैसा पीला, चिकना, बिना धब्बे वाला और पारदर्शी होता है।
ज्योतिष में प्रयोग:
पुखराज को बृहस्पति का रत्न माना गया है। गुरु का असर कमजोर हो तो इसे पहनाया जाता है। इसे समृद्धि, दानशीलता, सांसारिक सुख और आयु बढ़ाने वाला कहा गया है। ऐसा भी माना जाता है कि यह बुद्धि बढ़ाता है और मन के अनजाने भय को कम करता है। धनु और मीन राशि के स्वामी बृहस्पति हैं, इसलिए इन लग्न वालों के लिए यह अनुकूल माना जाता है। जिन कन्याओं के विवाह में बहुत कोशिश के बाद भी देरी हो रही हो, उन्हें विवाह कारक ग्रह गुरु को बल देने के लिए ज्योतिषी पुखराज की सलाह देते हैं। आयुर्वेद में भी कई रोगों के उपचार में इसके प्रयोग का उल्लेख मिलता है।
धारण विधि:
पुखराज स्वर्ण या पंचधातु में पहनना चाहिए। वजन 6, 11 और 15 रत्ती नहीं होना चाहिए। किसी भी महीने के शुक्ल पक्ष के गुरुवार को सूर्योदय से पहले उठकर शिव जी और विष्णु जी का पूजन करें। फिर रत्न को गाय के कच्चे दूध, शुद्ध घी और गंगाजल से शुद्ध करके इस मंत्र का 108 बार जाप करें और तर्जनी उंगली में पहनें:
ॐ बृं बृहस्पतये नमः।
6. हीरा (Diamond)
परिचय:
हीरे को रत्न शिरोमणि कहना गलत नहीं होगा। किसी भी चीज को सबसे बढ़िया बताना हो तो अक्सर उसे “हीरा” ही कहा जाता है। यह सबसे कठोर रत्न है, जिसे किसी दूसरी चीज से खरोंचा नहीं जा सकता। इसके किनारों से झांकने पर इंद्रधनुष जैसे रंगों की झिलमिलाहट दिखती है, क्योंकि इसमें प्रकाश का पूरा आंतरिक परावर्तन होता है। यही वजह है कि इसकी कीमत इतनी ज्यादा होती है। प्राचीन भारत में तमिलनाडु की पेन्नार नदी, और बुंदेलखंड की सोन और खान नदी से हीरे निकलते थे। भारत का कोहिनूर हीरा अपनी सुंदरता के लिए पूरी दुनिया में मशहूर रहा है। गरुड़ पुराण में हीरे के रंग और स्वभाव के आधार पर उसके कई भेद बताए गए हैं।
ज्योतिष में प्रयोग:
गरुड़ पुराण के अनुसार हीरा धन, अनाज और संतान संपदा बढ़ाने वाला रत्न है। भौतिक सुख-सुविधा और भोग-विलास बढ़ाने में इसे उपयोगी माना गया है, इसीलिए पुराने समय में धनी वर्ग इसे खूब पहनता था। हीरा शुक्र का रत्न है, और ज्योतिष में शुक्र काम सुख का कारक ग्रह होता है। शुक्र की शक्ति बढ़ाने के लिए हीरा पहनाया जाता है। वृषभ और तुला लग्न वालों के लिए इसे आसानी से अपनाने योग्य माना जाता है। भावप्रकाश जैसे आयुर्वेद ग्रंथों में हीरे की भस्म का जिक्र मिलता है। पर बिना योग्य ज्योतिषी की सलाह के हीरा पहनने से बचना चाहिए।
धारण विधि:
हीरा सोने या चांदी में पहना जाता है। किसी भी महीने के शुक्ल पक्ष के शुक्रवार को सूर्योदय के बाद शुक्र की होरा में इसे अनामिका में पहना जा सकता है, कुछ स्थितियों में मध्यमा में भी। पहनने से पहले भगवान लक्ष्मी-नारायण का पूजन करें, फिर रत्न को पंचामृत, गुलाबजल और गंगाजल से धोकर इस मंत्र का जाप करें:
ॐ शुं शुक्राय नमः।
7. नीलम (Blue Sapphire)
परिचय:
नीले रंग की आभा वाला यह रत्न अपना असर जल्दी दिखाने के लिए जाना जाता है। बहुत से लोग इसकी तरफ खिंचते तो हैं, पर भीतर से डरे भी रहते हैं। माणिक्य की तरह यह भी कुरुंदम श्रेणी का रत्न है। संस्कृत में इसे इंद्रनील, नीलमणि और शौरिरत्न कहा गया है। भारत के कश्मीर का नीलम सबसे सुंदर और उच्च गुणवत्ता वाला माना जाता है, जिसका रंग मोर की गर्दन जैसा होता है, और इसी वजह से इसकी कीमत भी बहुत ज्यादा होती है। बर्मा, श्रीलंका और दक्षिण भारत के सलेम जिले का नीलम भी अच्छा गिना जाता है। पुराने ग्रंथों में इसके दो भेद बताए गए हैं: जिसके भीतर श्याम आभा और बाहर नीलापन हो वह इंद्रनील, और जिसके भीतर श्वेत आभा और बाहर नीलापन हो वह जलनील।
ज्योतिष में प्रयोग:
नीलम पर सूर्य पुत्र और कर्मफल दाता शनिदेव का अधिकार माना गया है, इसलिए वे अपना फल तेजी से दिखाते हैं। तिब्बत के लामा योगी इसे मन की गहरी शांति के लिए उपयुक्त मानते हैं, जबकि भारतीय ज्योतिष इसे लेकर खास सतर्क रहने की सलाह देता है। कहा जाता है कि नीलम अनुकूल पड़ जाए तो रातों-रात फर्श से अर्श पर पहुंचा देता है, और प्रतिकूल पड़ जाए तो उलटा असर भी हो सकता है। इसीलिए बिना उचित सलाह के नीलम नहीं पहनना चाहिए। शनिदेव मकर और कुंभ राशि के स्वामी हैं। जन्मपत्रिका में शनि कमजोर हो पर शुभ फल देने में सक्षम हो, तो नीलम से उसका बल बढ़ाया जा सकता है। शनि की महादशा और साढ़ेसाती के समय यह खास तौर पर फलदायी माना जाता है।
धारण विधि:
नीलम चांदी, स्वर्ण या पंचधातु में पहना जा सकता है। किसी भी महीने के शुक्ल पक्ष के शनिवार या शनि त्रयोदशी को इसे धारण करें। पहनने से पहले शिव जी का विधिवत पूजन करके उनसे आज्ञा लें, फिर रत्न को गाय के दूध और गंगाजल से धोएं। शनिदेव के इस मंत्र का 108 बार जाप करके मध्यमा उंगली में पहनें:
ॐ शं शनैश्चराय नमः।
8. गोमेद (Hessonite)
परिचय:
नवरत्नों में गोमेद की जगह भी खास है। यह देखने में सुंदर होता है और कई रंगों में आसानी से मिल जाता है। गौमूत्र जैसा पीला और गहरा लाल गोमेद सबसे आकर्षक माना जाता है। हीरे के बाद सबसे ज्यादा चमक इसी में होती है। यह तलछट में मिलने वाली गोल, चिकनी चट्टानों में पाया जाता है। ऑस्ट्रेलिया, थाईलैंड और श्रीलंका में सबसे ज्यादा गोमेद मिलता है। श्रीलंका के गोमेद बहुत सुंदर होते हैं, और वहां के लोग तो लंबे समय तक रंगहीन गोमेद को हीरा ही समझते रहे। आयुर्वेद और पुराने ज्योतिष ग्रंथों के हिसाब से गोमेद पहचानने के लिए उसकी साफ गौमूत्र जैसी कांति, चिकनाई और वजन पर ध्यान देना चाहिए।
ज्योतिष में प्रयोग:
भारतीय ज्योतिष में गोमेद पर राहु का नियंत्रण माना गया है, और राहु को भ्रम का कारक कहा जाता है। जिनकी कुंडली में राहु का फल बहुत नकारात्मक हो गया हो, उन्हें गोमेद दान करने की सलाह दी जाती है। वहीं राहु की स्थिति शुभ हो तो उसका सकारात्मक फल बढ़ाने के लिए गोमेद पहनाया जाता है। ऐसा माना जाता है कि अनिद्रा और त्वचा संबंधी परेशानियां राहु की उलटी स्थिति से जुड़ी हो सकती हैं, और सावधानी से गोमेद के प्रयोग से इनमें राहत मिल सकती है।
धारण विधि:
गोमेद चांदी या हो सके तो अष्टधातु में 6, 11 या 13 रत्ती का पहना जा सकता है, जबकि 7, 10 या 16 रत्ती का नहीं पहनना चाहिए। किसी भी महीने के बुधवार या शनिवार की सुबह भोलेनाथ और देवी दुर्गा का पूजन करें, रत्न को गंगाजल से धोएं और इस मंत्र से अभिमंत्रित करके दाहिने हाथ की मध्यमा में पहनें:
ॐ रां राहवे नमः।
9. लहसुनिया (Cat’s Eye)
परिचय:
प्राचीन संस्कृत साहित्य में लहसुनिया को वैदूर्य मणि और विडालाक्ष भी कहा गया है। विडालाक्ष इसलिए कि जैसे अंधेरे में बिल्ली की आंखें चमकती हैं, वैसी ही चमक इस रत्न में दिखती है। अंग्रेजी में इसे कैट्स आई ही कहते हैं। इसमें पीलेपन के साथ सफेद धागे जैसी धारियां होती हैं, और घुमाने पर यह चमकती रेखा अपनी जगह बदल लेती है। भारत में तिरुवनंतपुरम, श्रीलंका, चीन और ब्राजील में यह काफी मात्रा में मिलता है। काली और सफेद आभा वाला, साफ और चमकदार लहसुनिया उत्तम माना जाता है।
ज्योतिष में प्रयोग:
भारतीय ज्योतिष में लहसुनिया पर केतु का अधिकार माना गया है। केतु से पैदा होने वाले दोषों को शांत करने में इसकी भूमिका बताई जाती है। बहुत गुस्सा आना, ज्यादा तनाव, उदासी, रहस्यमय बने रहना और अकेले रहने की आदत, ये सब केतु के बुरे असर में गिने जाते हैं। ऐसी स्थिति में कुंडली देखकर लहसुनिया दान या धारण करने की सलाह दी जाती है। कहा जाता है कि यह पहनने वाले को अचानक होने वाली दुर्घटनाओं और छिपी साजिशों से भी बचाता है। आयुर्वेद के अनुसार पित्त बिगड़ने से होने वाली परेशानियों में इसका असर देखा गया है।
धारण विधि:
लहसुनिया किसी भी महीने के शनिवार या मंगलवार को स्वर्ण या चांदी में पहना जा सकता है। 3, 5 या 7 कैरेट का लहसुनिया शुभ माना जाता है, जबकि 2, 4, 11 और 13 रत्ती का नहीं पहनना चाहिए। जिस दिन पहनना हो, उस दिन पहले भगवान गणेश का विधिवत पूजन करें, रत्न को पंचामृत से शुद्ध करें, फिर गंगाजल से धोकर इस मंत्र से अभिमंत्रित करके धारण करें:
ॐ कें केतवे नमः।
रत्न पहनते समय इन बातों का ध्यान रखें
रत्न को दवा की तरह देखना चाहिए। एक ही रत्न किसी के लिए फायदेमंद और किसी के लिए उलटा असर करने वाला हो सकता है, यह पूरी कुंडली पर निर्भर करता है। इसलिए कोई भी रत्न पहनने से पहले किसी योग्य ज्योतिषी से सलाह जरूर लें। अपने लिए कौन सा रत्न उपयुक्त हो सकता है, यह समझने के लिए हमारा रत्न कैलकुलेटर भी देख सकते हैं।
यह जानकारी पारंपरिक ज्योतिष और आयुर्वेद ग्रंथों में मिलने वाली बातों पर आधारित है। रत्नों को लेकर बताए गए असर लोगों की मान्यता और परंपरा से जुड़े हैं, इन्हें किसी बीमारी के इलाज का विकल्प न समझें।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
नवरत्न में कौन सा रत्न किस ग्रह का माना जाता है?
सूर्य का माणिक्य, चंद्रमा का मोती, मंगल का मूंगा, बुध का पन्ना, बृहस्पति का पुखराज, शुक्र का हीरा, शनि का नीलम, राहु का गोमेद और केतु का लहसुनिया माना जाता है। इन्हीं नौ को मुख्य रत्न कहा जाता है।
क्या बिना ज्योतिषी की सलाह के रत्न पहन सकते हैं?
बेहतर यही है कि न पहनें। रत्न का असर कुंडली के ग्रहों की स्थिति पर टिका होता है। शास्त्रों में भी कहा गया है कि रत्न औषधि जैसे होते हैं, जिनका फैसला योग्य जानकार ही कर सकते हैं। नीलम, हीरा और मूंगा को लेकर तो खास सतर्कता बरती जाती है।
उपरत्न क्या होते हैं?
नौ मुख्य रत्नों के विकल्प के रूप में जो रत्न पहने जाते हैं, उन्हें उपरत्न कहा जाता है। शास्त्रों में इनकी गिनती 84 बताई गई है। ये भी काफी प्रचलित हैं, पर ज्योतिषी ग्रहों के उपचार में मुख्य रूप से इन्हीं नौ रत्नों का सहारा लेते हैं।
असली और नकली रत्न में फर्क कैसे करें?
आजकल बाजार में माणिक्य जैसे कई रत्न ज्यादातर बनावटी बिकते हैं, और मोती भी कृत्रिम तरीके से बनते हैं। प्राकृतिक और कृत्रिम रत्न की चमक और गुणों में अंतर होता है। खरीदते वक्त किसी भरोसेमंद जानकार या प्रमाणित जौहरी से जांच जरूर करवाएं।
नीलम को लेकर इतनी सावधानी क्यों बरती जाती है?
नीलम पर शनिदेव का अधिकार माना गया है, जो अपना फल तेजी से दिखाते हैं। कहा जाता है कि अनुकूल पड़े तो बहुत लाभ देता है और प्रतिकूल पड़े तो उलटा असर भी संभव है। इसीलिए इसे बिना उचित परामर्श के पहनने से मना किया जाता है।
